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नमाज़ का सही तरीक़ा

मुकम्मल नमाज़ का सहीह तरीक़ा अहादीस के मुताबिक़

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ


रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया “ नमाज़ उस तरह पढ़ो जिस तरह मुझे
 पढ़ते हुए देखते हो. ”
[बुख़ारी ह० 631]

क़याम का सुन्नत तरीक़ा

◾ पहले ख़ाना-ए- काबा की तरफ़ रुख़ करके खड़े होना
[इब्न माजा ह० 803 ]

◾ अगर बाजमात नमाज़ पढ़े तो दूसरों के कंधे से कंधा और टख़ने से टख़ना मिलाना.
[अबू दाऊद ह० 662]

◾ फिर तक्बीर कहना और रफ़अ़ यदैन करते वक़्त हाथों को कंधों तक उठाना
[बुख़ारी ह० 735, मुस्लिम ह० 861]

या कानों तक उठाना

फ़र्ज़ नमाज़ के बाद के अज़कार (दुआएं)



1. नमाज़ में आखिरन सलाम फेरने के बाद  बुलंद आवाज़ में "अल्लाहु अकबर" (अल्लाह सबसे बड़ा है)
कहनी चाहिए

(सही मुस्लिम, किताबुल मसजिद 583)

2. फिर तीन दफा असतगफ़िरुल्लाह (मैं बख्शीश मांगता हूँ अल्लाह से) कहनी है
फिर उसके बाद "अल्लाहुम्मा अंतस्सलामु मिंकससलामु तबरक्ता ज़लजलाली वलइकराम" (या अल्लाह तू ही सलामती वाला है और तेरी ही तरफ से सलामती है, तू बहुत ही बा-बरकत है ऐे बुज़ुर्गी और इज़्ज़त वाले) पढ़नी चाहिए.

(सही मुस्लिम, किताबुल मसजिद 591)

नोट: इसी दुआ में अक्सर लोग "व-इलैका यरजेउससलामु  हईएना रब्बना बिस्सलामु व-अदखिलना दारससलामु" का इज़ाफ़ा कर के पढ़ते है जो की सही नहीं है क्यूंकि हदीस में ये इज़ाफ़ा कही भी रसूलल्लाह (ﷺ) से साबित नहीं है.

3.  "अल्लाहुम्मा अ-इन्नी अला जिक्रिका व शुक्रिका व हुस्नी इबादतिका " (ऐे  अल्लाह, मेरी मदद फरमा ताकि मैं तेरा ज़िक्र, तेरा शुक्र और तेरी इबादत कर सकूँ )
(अबु दाऊद किताबुल वितर 1522)

4. "ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहु ला शरिकलहु लहूल मुल्क व लहूल हम्द व हुआ अला कुल्ले शैइन क़दीर अल्लाहुम्मा ला मानीआ लिमा अअतैता वला मुअ तिअ लिमा मनअतअ वला यनफउ ज़लजद्दी मिंकल जद्दो"
(नहीं है कोई माबूद सिवा अल्लाह के, वह अकेला है कोई उसका शरीक नहीं, उसके लिए बादशाही है और उसी के लिए सभी तारीफें हैं और वह हर चीज़ पे क़ादिर है. ऐ अल्लाह जो चीज़ तू दे कोई नहीं रोक सकता, और जिस चीज़ से तू रोक ले उसे फिर कोई नहीं दे सकता, और साहबे हैसियत को उसकी दौलत नहीं बचा सकती तेरे अज़ाब से)

(अबु दाऊद किताबुल वितर 1505)

5. "ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहु ला शरिकलहु लहूल मुल्क व लहूल हम्द व हुआ अला कुल्ले शैइन क़दीर ला हउला वला कुवता इल्ला बिल्लाही ला इलाहो वला नअबुदू  इल्ला अईयाह लहूंनेअमतो व लहुलफजलो व लहससनाउल हसनो ला इलाहा इल्लल्लाहु मुखलिसीनअ लहुद्दीनअ वलौ करेहल काफिरून"
(नहीं है कोई माबूद सिवा अल्लाह के, वह अकेला है कोई उसका शरीक नहीं, उसके लिए बादशाही है और उसी के लिए सभी तारीफें हैं और वह हर चीज़ पे क़ादिर है. नहीं है गुनाह से बचने की हिम्मत और नेकी करने की क़ूवत मगर अल्लाह की तौफ़ीक़ से, अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और हम उसके सिवा किसी और की इबादत नहीं करते ,उसका हम पर एहसान है और उसीका फज़ल है और  वही हर तारीफ का हक़दार है ,अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और हम सिर्फ उसी की बंदगी करते हैं भले ही काफिर बुरा समझे )

(अबु दाऊद किताबुल वितर 1506)

6. सुब्हान अल्लाह 33
   अल्हम्दुलिल्लाह 33
   अल्लाहु अकबर 34  दफा

या फिर

सुब्हान अल्लाह 33
अल्हम्दुलिल्लाह 33
अल्लाहु अकबर 33 और फिर  एक दफा "ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहु ला शरिकलहु लहूल मुल्क व लहूल हम्द व हुआ अला कुल्ले शैइन क़दीर"

(सही मुस्लिम, किताबुल मसाजिद 597)


7. अल-मुअव्वीज़ात यानि क़ुरआन की आखिरी २ सूरतें
"क़ुल औजुबिरबिलफ़लक़......." और "क़ुल औजुबिरब्बिननास........ "

(अबु दाऊद किताबुल सलात 1523, सुनन अल-निसाई 1336)

8. आयतुल कुर्सी  "अल्लाहु ला इलाहा इल्लाहु वलहैयुल क़य्यूम............ " 
(सुरह बकरा आयत 255)



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